मोबाइल
फोन आधुनिक युग में जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। हालांकि मोबाइल ने भले ही हमें
वर्चुअल जगत में अधिक सामाजिक और संप्रेषणीय बना दिया है लेकिन वास्तविक सामाजिकता
के तानेबाने को यह उधेड़ रहा है। इसलिए अगर कभी मोबाइल गुम हो जाए तो इसको ढूँढने
की छटपटाहट की बजाए इसके बिना कुछ समय बिता कर देखिये वास्तविक समाज अधिक रोमांचक हो
सकता है।
इसमें
कोई दो राय नहीं है कि मोबाइल फोन से हमारे दैनिक कामकाज़ सुलभ हुए हैं। दूर बैठे
अपनों से अपनी भावनाएं सीधे साझा करने का अहम मंच मोबाइल ने ही हमें सहज कराया है।
मोबाइल फोन ने हमारी सम्प्रेषण शैली को भी धार दी है। हम आमने-सामने किसी से जो
बात सीधे तौर पर कहने में हिचकते हैं वही बात मोबाइल के माध्यम से आसानी से कह
जाते हैं। मोबाइल पर भाषाओं के अलावा संकेतकों की मदद से भी लोग अपनी बातें एक
दूसरे तक प्रेषित कर पाते हैं।
मोबाइल
फोन ने एक ओर वर्चुअल जगत में बड़े मंच पर अपने को प्रस्तुत करने में लोगों की बेइंतेहा
मदद की है। दूसरी ओर मोबाइल ने हमें अपने वास्तविक समाज से दूर कर दिया है। घरों
में, दफ्तर में, स्कूल में या अन्य किसी जगह मोबाइल में एक के बाद
एक एप्लिकेशन पर घूमते लोग, शायद यह भूल जाते हैं कि उनके आसपास जो लोग हैं
उन्हें उनके समय की ज़रूरत है।
आज
ट्रेन में बैठा लगभग हर यात्री वर्चुअल संसार की सैर करता है। अधिकतर यात्रियों को,
सहयात्रियों से विचार और अनुभव साझा करने में दिलचस्पी कम है। बुजुर्ग हो रहे
माता-पिता, दादा-दादी से मोबाइल के चलते बच्चे और पोते और दूर
होते जा रहे हैं। इसलिए कभी अगर मोबाइल खो जाए तो इस पाने के लिए बेचैन होने की
बजाय क्यूँ ना इसकी दुनिया से बाहर निकलकर देखें? कभी कभी गुदगुदाने वाला
यही मोबाइल अक्सर तनाव भी देता है। क्यूँ ना इससे कुछ समय के लिए दूर होने के बाद
वास्तविकता से अपने आपको जोड़े?
